Guru Jambheshwar Bishnoi: Religion with a difference

शब्द ॥3॥
ॐ मोरे अंग न अलसी तेल न मलियो ।
ना परमल पीसायों।
जीमत पीवत भौगत बिलसत् ॥
दीसा नाहीं महापण को आधारुं।
अठ सठ तीर्थ हिरदा भीतर बाहर लोका चारूं ॥
नान्हीं मोटी जीया जूणीं।
एती सास फ़ुरन्ते सारुं ॥
बासन्दर क्यों एक भणीजै ।
जिहिं के पवन पिराणों ॥
आला सूका मेल्हे नांही ।
जिंहि दिश करे मुहाणो ॥
पापै गुन्है बीहै नांही।
रीस करै रीसाणों ॥
बहुली दौरे लावण हारुं।
भावै जाण मैं जाँणू न तूं सूर नर न तूं शंकर ।
न तूं रावण राणों ॥
काचै पिंडे अकाज चलावै ।
म्हा अधूरत दाणों ॥
मोर छुरी न धारुं।
लोहे न सारूं ॥
न हथियारूं।
सूरज का रिपु बिहडा नांही ॥
तातै कहा उठावत भारूं जिहिं हाकण ड़ी बलद जूं हांके ना लोहे की आरूं ॥
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